ﻁ Origin of Rashtriya Swabhiman Andolan | राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन | RASHTRIYA SWABHIMAN ANDOLAN

 

राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन | RASHTRIYA SWABHIMAN ANDOLAN

  साहस - पहल - प्रयोग        संवाद - सहमति - सहकार         Courage - Initiative - Exeperiment         Dialogue - Concurrence - Collaboration


ABOUT US | संगठन के बारे में

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन

(संस्थापक व संरक्षक – के. एन. गोविन्दाचार्य)


पृष्ठभूमि

मई, 2004 में लोकसभा चुनाव के पश्चात जब श्रीमती सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री  बनने की आशंका उत्पन्न हो गयी, तब 15 मई, 2004 को राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के बैनर तले सफल अभियान चला। नवंबर, 2004 को प्रथम भारत विकास संगम का आयोजन हुआ, जिसमें तब तक संपर्क में आये हुए साथियों की सहभागिता रही। इसी सम्मेलन में व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता और अपरिहार्यता को प्रतिपादित किया गया। साथ ही व्यवस्था परिवर्तन के लक्ष्य को पाने के लिए रचनात्मक, आंदोलनात्मक तथा बौद्धिक कार्यों की त्रिवेणी को गुंथे जाने का संकल्प भी लिया गया। 2005 से 2007 तक देश में सघन प्रवास के द्वारा अधिकाधिक क्रियाशील सज्जन-शक्तियों से संवाद बढ़ाया गया। जनवरी, 2008 में द्वितीय भारत विकास संगम का आयोजन हुआ, जिसमें रचनात्मक, आंदोलनात्मक और बौद्विक कार्यों के स्वतंत्रा संगठनों के निर्माण का निर्णय हुआ। तदनुसार रचनात्मक कार्यों के लिए भारत विकास संगम, आंदोलनात्मक कार्यों के लिए राष्ट्रीय स्वाभिमान  आंदोलन तथा बौद्विक कार्यों के लिए समग्र शोध संस्थान का पंजीकरण कराया गया।

हमारा लक्ष्य- व्यवस्था परिवर्तन

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की स्थापना का लक्ष्य है- ‘व्यवस्था परिवर्तन’। वर्तमान में देश और समाज की जो नाजुक दशा है उसमे राष्ट्रीय एकता-अखंडता के खतरे से लेकर सामाजिक विखराव तक से इंकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में व्यवस्था को जड़ से उखाड़ पफेंकने जैसे दुधारी रास्ते से बचना ही अधिकांश विचारशील नेता श्रेयस्कर मानते हैं। उनका मानना है कि वर्तमान व्यवस्था में ढांचागत और नीतिगत बड़े-बड़े बदलाव तथा सुधार करके भी हमें वांछित परिवर्तन प्राप्त हो जाएगा। देश और समाज की संवेदनशील परिस्थिति से अवगत होने के कारण पिफलहाल राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन दूसरे रास्ते को वरणीय मानता है।
माननीय जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति से 1977 में हुआ सत्ता परिवर्तन, बोपफोर्स घोटाले के आधार पर हुआ सत्ता परिवर्तन तथा 1998 में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम से सत्ता परिवर्तन हुआ था। तीनों बार का सत्ता परिवर्तन स्थापित व्यवस्था में सतही परिवर्तन करने में भी नाकामयाब रहा। इस असपफलता के पीछे मूल कारण था पहले से व्यवस्था परिवर्तन का मूर्त खाका न होना। इन ऐतिहासिक भूलों से सीख लेते हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन अपना अंगीकृत कर्तव्य मानता है कि व्यवस्था परिवर्तन के मौलिक विषयों पर हमारा मूर्त खाका यथाशीघ्र तैयार हो तथा संगठन में सर्वस्वीकृत होकर सर्वज्ञात हो।

हमारा अधिष्ठान-समग्र विकास

व्यवस्था परिवर्तन से हम चाहते हैं-प्रत्येक व्यक्ति को मेहनत की रोटी और इज्जत की जिंदगी सुलभ हो तथा हमारा भारत विश्व में गौरवशाली पद पर प्रतिष्ठित हो। हमें यहीं नहीं रुकना है, हमें दुनिया को कुछ देने का भी सामर्थ्य पाना है। इसके लिये हमें भारतीय जीवन दृष्टि पर आधारित विकास मार्ग अपनाना होगा। विगत 500 वर्षों से चले आये प्रकृति के शोषण पर आधारित मानव केन्द्रित विकास के स्थान पर प्रकृति के साथ संतुलन बिठाकर विकास का रास्ता अपनाना होगा। प्रकृति के साथ संतुलन भी पश्चिम के एकांगी भौतिक विकास से प्राप्त समृद्धि मे संभव नहीं। इसके लिये समृद्धि और संस्कृति के समन्वित संवर्धन से प्राप्त समग्र विकास ही रास्ता है। यह समग्र विकास ही हमारे व्यवस्था परिवर्तन का अधिष्ठान रहेगा।