अम्बानी गैस विवाद में सरकारी बेईमानी उजागर

पिछले कुछ दिनों से अखबारों के पन्ने अंबानी बंधुओं के विवाद से रंगे नजर आ रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे दो भाई गैस के रूप में मिली राष्ट्रीय संपत्ति आपस में बांटने के लिए झगड़ रहे हैं और सरकार जनता के हित में गैस पर अपना नियंत्रण रखना चाहती है। लेकिन यह सब एक कुटिल रणनीति के तहत प्रचारित किया जा रहा है। सच्चाई कुछ और ही है। वास्तव में इस विवाद ने सरकार में शीर्ष स्तर पर फैले भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया है। पूरे विवाद को समझने के लिए विषय को थोड़ा विस्तार में समझना जरूरी होगा।कुछ वर्ष पहले सरकार ने तेल और गैस की खोज के लिए ओएनजीसी के साथ-साथ कई देशी-विदेशी कंपनियों को देश में तेल और गैस खोजने के लिए आमंत्रित किया, जिनमें रिलायंस भी थी। सभी कंपनियों को कुल 162 ब्लाक्स में तेल और गैस खोजने का ठेका दिया गया। इसमें से एक ब्लाक डी-6 पर रिलायंस ने गैस की खोज की और उत्पादन शुरू किया। इस गैस को निकालने और बेचने के संबंध में सरकार और रिलायंस इन्डस्ट्रीज लिमिटेड के बीच एक समझौता हुआ।
सरकार और रिलायंस के बीच गैस उत्पादन को लेकर हुए समझौते की शर्तें :
- गैस निकालने में रिलायंस का जो भी खर्चा होगा, उसे वह पूरा का पूरा गैस बेचकर वसूल करेगी। जब तक यह खर्चा वसूल नहीं हो जाता तब तक सरकार को गैस में से न तो कोई हिस्सा मिलेगा और न ही कोई रायल्टी मिलेगी।
- गैस निकालने में कितना खर्चा हुआ, यह रिलायंस और सरकार द्वारा मिलकर तय किया जाएगा।
- खर्चा पूरा होने के बाद जो गैस निकलेगी, उसकी बिक्री पर सरकार को रायल्टी मिलेगी। रायल्टी के लिए गैस की एक आदर्श कीमत सरकार और रिलायंस द्वारा मिलकर तय की जाएगी। हालांकि इस कीमत पर ही गैस बेची जाए, यह जरूरी नहीं है। बाजार में बिक्री के लिए रिलायंस गैस की कीमत अपने स्तर पर तय करने के लिए स्वतंत्र है। उसमें सरकार हस्तक्षेप नहीं करेगी।
विवाद की जड़ें :
पिछले कुछ वर्षों में जो खोज हुयी है, उससे पता चला है कि देश में गैस के विशाल भंडार हैं। अभी देश में गैस का उत्पादन मांग से कम है, लेकिन तीन-चार साल बाद हालात बिल्कुल उल्टे होंगे। 2007 में पेट्रोलियम मंत्री ने संसदीय समिति को बताया था कि मार्च, 2009 तक देश में गैस का उत्पादन 95 मिलियन क्यूबिक मीटर प्रतिदिन से बढ़कर 190 मिलियन क्यूबिक मीटर प्रतिदिन हो जाएगा।
रिलायंस को इस बात का अंदाजा था। इसलिए उसने अपने कुएं से निकलने वाली गैस के लिए अच्छी कीमत देने वाले और नियमित खरीदने वाले ग्राहकों को खोजने की शुरुआत की। 2004 में जब एनटीपीसी ने गैस के लिए ग्लोबल टेंडर निकाला तो रिलायंस ने उसमें भाग लिया। यह टेंडर रिलायंस को मिला। 2.34 डालर प्रति यूनिट की दर से उसने एनटीपीसी को 12 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस देना स्वीकार किया। मुकेश अंबानी के नियंत्रण वाली रिलायंस ने अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली आर एन आर एल को भी 2.34 डालर प्रति यूनिट की दर से 28 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस देना स्वीकार किया। कुंओं से गैस निकालने में रिलायंस का खर्चा मात्र .89 डालर है। इसलिए उसके लिए यह दाम फायदे का ही था। लेकिन ये सौदे करने के बाद तेल और गैस की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक बढ़ गयीं। बढ़ी कीमतों ने रिलायंस के मालिक मुकेश अंबानी का मन बदल दिया और उन्होंने एनटीपीसी और अनिल अंबानी की कंपनी आएएनआरएल दोनों को गैस देने से मना कर दिया। इस कारण दोनों पीड़ित कंपनियों ने मुम्बई उच्च न्यायालय में अपील की। उन्होंने न्यायालय से आग्रह किया कि रिलायंस को 2.34 डालर प्रति यूनिट की दर से गैस देने के लिए निर्देशित किया जाए। एनटीपीसी का मामला अभी चल ही रहा है, लेकिन अनिल अंबानी की कंपनी आरएनआरएल के मामले में मुम्बई उच्च न्यायालय ने अभी हाल ही में अपना फैसला सुना दिया है। फैसले के मुताबिक मुकेश अंबानी के नियंत्रण वाली कंपनी रिलायंस को 2.34 डालर प्रति यूनिट की दर से 17 वर्षों तक आरएनआरएल को 28 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस की आपूर्ति प्रतिदिन करनी है। यदि किन्हीं कारणों से एनटीपीसी अपने हिस्से की 12 मिलियन क्यूबिक मीटर गैस नहीं लेती है तो वह गैस भी आरएनआरएल को बेचने का निर्देश दिया गया है। फिलहाल उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ रिलायंस ने उच्चतम न्यायालय की शरण ली है। उच्चतम न्यायालय में अभी यह केस चल रहा है। कोई फैसला नहीं आया है।
सरकार संदेह के घेरे में :
रिलायंस इन्डस्ट्रीज और आरएनआरएल तथा एनटीपीसी के बीच जो विवाद है, वह कारपोरेट दुनिया में अक्सर होता रहता है। इन विवादों को वे न्यायालयों और आपसी बातचीत के द्वारा सुलझाते आए हैं। इस बार भी यही होता, लेकिन सरकार के पेट्रोलियम मंत्री ने इस मामले को बुरी तरह उलझा दिया। वो खुलकर मुकेश अंबानी की कंपनी को फायदा पहुंचाने में लग गए हैं। मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत के तहत पेट्रोलियम मंत्री के कारनामों के लिए पूरे मंत्रिमंडल को जिम्मेदार माना जाएगा। इस तरह मौजूदा गैस विवाद ने पूरी सरकार के काले चेहरे को उजागर कर दिया है। यह कोरा आरोप नहीं है। इसके पीछे ढेर सारे ठोस प्रमाण हैं।
रिलायंस द्वारा अपने कुएं से 40 MMSCMD गैस निकालने के लिए 12,000 करोड़ रुपए का खर्च स्वीकृत कराया गया था। अभी हाल ही में रिलांयस की ओर से कहा गया कि वह अब 80 MMSCMD गैस निकालेगी और इसके लिए 45,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे। पेट्रोलियम मंत्रालय ने इस बढ़े हुए खर्च को तुरंत मंजूरी दे दी। समझौते के मुताबिक इसका मतलब है कि जब तक 45 हजार करोड़ की गैस न बिक जाए सरकार को एक पैसा भी नहीं मिलेगा। बढ़े हुए खर्चे अतार्किक और मनमाने हैं। सवाल उठता है कि जब 40 MMSCMD गैस निकालने में 12,000 करोड़ रुपए का खर्च आता है तो 80 MMSCMD गैस के लिए 45,000 करोड़ रुपए कैसे हो गए। विशेषज्ञों के मुताबिक यह खर्चा किसी भी हालत में 20,000 करोड़ से अधिक नहीं हो सकता। इस प्रकार 25,000 करोड़ रुपए बिना किसी बात के रिलायंस की झोली में डाल दिए गए।
सरकारी नियमों के अनुसार 150 करोड़ रुपए से अधिक के किसी भी सरकारी खर्च के लिए आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी की स्वीकृति लेनी आवश्यक है। इस मामले में जहां 45,000 करोड़ रुपए का सवाल था, कैबिनेट कमेटी से मंजूरी लेना आवश्यक नहीं समझा गया। सरकार की ओर से नियुक्त दो कनिष्ठ अधिकारियों (एक पेट्रोलियम मंत्रालय से और एक डायरेक्टर जनरल हाइड्रो कार्बन से) ने इतना बड़ा निर्णय ले लिया।
जब इस बढ़े हुए खर्चे को लेकर कुछ आपत्ति दर्ज करायी गयी तो सरकार ने दो विशेषज्ञों को जांच के लिए नियुक्त किया। इनमें से एक पी. गोपालकृष्णन हैं जो स्कूल आफ पेट्रोलियम टैक्नोलाजी में काम करते हैं। ध्यान देने की बात है कि स्कूल आफ पेट्रोलियम टैक्नोलाजी के चेयरमैंन रिलायंस के मालिक मुकेश अंबानी हैं। पी. गोपालकृष्णन के अलाव सरकार की ओर से एक इन्जीनियरिंग फर्म ‘मुस्तांग इन्जीनियरिंग’ को नियुक्त किया गया है। बताते चलें कि यही फर्म मुकेश अंबानी के लिए ठेके पर काम कर चुकी है। अब सवाल उठता है कि जो लोग मुकेश अंबानी के एहसानमंद हैं, वो भला सरकार के हित में कैसे सोचेंगे। सरकार का इन्हें अपना प्रतिनिधि बनाना पूरे मामले को संदेह के घेरे में डालने के लिए काफी है।
सरकार की बदनीयति एक और बात से जाहिर होती है। डायरेक्टर जनरल हाइड्रो कार्बन कहते हैं कि रिलायंस द्वारा जो खर्चे दिखाए जा रहे हैं, उनकी आडिटिंग की गयी है, जबकि सरकारी एजेंसी (कंट्रोलर एंड आडिटर जनरल) का कहना है कि उसे सभी संबंधित एकाउंट दिखाए ही नहीं गए। एकाउंटिंग को लेकर जब इतना विवाद हो, तब भी सरकार द्वारा रिलायंस के बढ़े हुए खर्चे को मंजूर करना साबित करता है कि दाल में काला है।
संसद में जब मौजूदा गैस विवाद को लेकर सरकार से सवाल पूछे गए तो बार-बार यह कहा गया कि सरकार आरएनआरएल और एनटीपीसी के साथ चल रहे विवाद में कोई पार्टी नहीं है। ये कारपोरेट विवाद हैं और न्यायालय के द्वारा उन्हें निपटा दिया जाएगा। सरकार ने यह भी कहा कि गैस किसको, किस कीमत पर और कब तक बेची जाए, इससे कोई लेना-देना नहीं है। वह तो गैस की एक आदर्श कीमत तय करेगी, जिसके आधर पर उसकी रायल्टी तय होगी। संसद में दिए गए बयानों के विपरीत सरकार (पेट्रोलियम मंत्री) अब यह कह रही है कि गैस किसको, किस कीमत पर और कितनी बेची जाए, यह वह खुद तय करेगी। मंत्री जी से पूछा जाना चाहिए कि क्या संसद में दिए गए बयान झूठे हैं?
यदि मुरली देवड़ा जी मानते हैं कि गैस को बेचने का निर्णय सरकार की अनुमति के बिना नहीं लिया जा सकता तो कृपया वे बताएं कि रिलायंस के खिलाफ अभी तक कार्रवायी क्यों नहीं की गयी। क्योंकि यह एक निर्विवाद तथ्य है कि रिलायंस ने सरकार से अनुमति लिए बिना ही एनटीपीसी और आरएनआरएल से गैस बेचने का समझौता किया था। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। मंत्री महोदय रिलायंस के लिए रास्ता आसान करने में ही लगे हैं।
श्री मुरली देवड़ा की अगुआई में सरकार ने तय किया है कि आगे से रिलायंस द्वारा गैस 4.2 डालर प्रति यूनिट की दर से बेची जाएगी। सरकार का कहना है कि बढ़ी हुयी कीमत पर उसको रायल्टी अधिक मिलेगी, इसलिए यह देश के हित में है, जबकि तथ्य कुछ और हैं। सरकार और रिलायंस के बीच हुए समझौते के मुताबिक रायल्टी के लिए तय की गयी गैस की कीमत वास्तविक कीमत से अलग हो सकती है। यदि सरकार रायल्टी के लिए कीमत 4.2 डालर तय करती है और रिलायंस द्वारा एनटीपीसी तथा आरएनआरएल को 2.34 की दर से गैस बेची जाए तो भी सरकार को नुकसान नहीं होगा, क्योकि उसे रायल्टी 4.2 डालर की दर से ही मिलेगी। समझौते की इस शर्त को यदि सरकार भूल गयी है तो इसके कारण ढूंढने होंगे।
यदि रिलायंस द्वारा 4.2 डालर की दर से गैस बेची गयी तो पैट्रोलियम मंत्रालय को कुछ सौ करोड़ की रायल्टी अधिक मिलेगी। लेकिन सरकार की ही कंपनी एनटीपीसी को रिलायंस को हजारों करोड़ रुपए अधिक देने होंगे। यदि ऊर्जा मंत्रालय के हजारों करोड़ रुपए के लाभ और पेट्रोलियम मंत्रालय के कुछ सौ करोड़ के लाभ में चुनना हो तो स्वाभाविक रूप से ऊर्जा मंत्रालय के लाभ को चुनना चाहिए, भले ही पेट्रोलियम मंत्रालय को घाटा हो जाए। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। क्यों?
गैस का इस्तेमाल मुख्यत: ऊर्वरक और बिजली उत्पादन के क्षेत्र में किया जाता है। यदि गैस की कीमतें बढ़ायी जाती हैं तो इसका सीधा असर इनकी कीमतों पर पड़ेगा। इनकी कीमतों को कम रखने के लिए सरकार द्वारा भारी मात्रा में सब्सिडी दी जाती है। यदि इनकी कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार को अपना सब्सिडी बजट और बढ़ाना पड़ेगा। वित्तीय घाटा झेल रही सरकार के लिए यह एक तरह से आत्मघाती कदम होगा।
बिजली और ऊर्वरक के मामले देश की कमजोरी जगजाहिर है। यदि सरकार ने इन क्षेत्रों में समय रहते गैस की आपूर्ति शुरू करवा दी होती तो बिजली और ऊर्वरक के उत्पादन में कुछ तो सुधार हुआ होता। कई घंटों और कहीं कहीं कई दिनों के लिए पावर कट झेल रही देश की जनता को यदि बिजली की बेहतर आपूर्ति होती तो न केवल लोगों का जीवन स्तर बेहतर होता, बल्कि देश की जीडीपी में भी वृद्धि होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जनता के हित की परवाह किए बिना सरकार रिलायंस को फायदा पहुंचाने में लगी रही।
यहां एक और बात परेशान करती है। वह यह कि गैस का उत्पादन भारतीय इलाके में हो रहा है, गैस निकालने वाली कंपनी भारतीय है, फिर भी उसकी कीमतें सरकार डालर में क्यों तय कर रही है। इसका औचित्य समझ से परे है।
मुख्य विपक्षी पार्टी का निराशाजनक रवैया :
सरकार के एक मंत्रालय द्वारा जिस प्रकार मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को अवैध तरीके से फायदा पहुंचाने के लिए सार्वजनिक हित की अनदेखी की जा रही है, उस पर विपक्षी पार्टी होने के नाते भारतीय जनता पार्टी को कड़ा रवैया अपनाना चाहिए था। विपक्षी पार्टी के नाते यह उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन यह पार्टी जिन्ना जैसे फालतू विषय को लेकर उलझी हुयी है। इससे जनता का इस पार्टी पर रहा-सहा भरोसा भी उठ जाएगा।
हमारी मांग :
पेट्रोलियम मंत्री ने देश के हित को ताक पर रखकर रिलायंस इंडस्ट्रीज को लाभ पहुंचाने की कोशिश की है। यदि मनमोहन सिंह की सरकार उनके गलत काम में शामिल नहीं है, तो उसे तुरंत श्री मुरली देवड़ा को बर्खास्त करना चाहिए। साथ ही जिन सरकारी अधिकारियों ने इस मामले में नियमों के विरुद्ध काम किया है, उन्हें भी दंडित करने के लिए कार्रवायी की जाए।
रिलायंस इंडस्ट्रीज के पूरे गैस व्यवसाय की सीएजी के नेतृत्व में विस्तृत आडिटिंग की जाए। आडिट कमेटी में इंस्टीटयूट आफ चार्टर्ड एकाउंटेंट, इंस्टीटयूट आफ कास्ट एंड वर्क एकाउंटेंट तथा इंस्टीटयूट आफ इंजीनियर्स को शामिल किया जाए। यदि जांच में रिलायंस इंडस्ट्रीज को गैरकानूनी हथकंडे अपनाने का दोषी पाया जाए तो सरकार को चाहिए कि वह उसके कब्जे वाली गैस फील्ड का राष्ट्रीयकरण कर उसे अपने कब्जे में ले ले।
यदि सरकार गैस की कीमत और खरीददार तय करने के लिए वास्तव में अधिकृत है तो उसे गैस की कीमत 1.5 डालर प्रति यूनिट तय करनी और इस कीमत पर गैस को ऊर्वरक और बिजली बनाने से जुड़ी परियोजनाओं, शहरी परिवहन और घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता के आधार पर बेची जाए। महंगाई की मार झेल रही जनता को जहां इससे राहत मिलेगी, वहीं सरकार को लगभग पांच लाख करोड़ का लाभ होगा। परिणामस्वरूप देश के सामने जो वित्तीय घाटा है, वह पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
IMPORTANT RELATED DOCUMENTS :
RIL’s KG D6 Initial Development Plan
RIL’s KG D6 Revised Development Plan
Production Sharing Contract (PSC) between RIL, NIKO and the Govt
Gas Pricing Committee Report – November 2007
EGOM Minutes of Meeting Dated 12.09.2007
EGOM Minutes of Meeting Dated 28.05.2008
EGOM Minutes of Meeting Dated 23.10.2008
EGOM Minutes of Meeting Dated 08.01.2009
Parliament Questions on Gas Pricing and other related issues
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Before the grand lanch function of “Bharat Swabhiman Mission”
Baba Ramdev seems to be genueinly interested
in the betterment of desh, dharam, rajniti
and i used to watch him on Aastha channel regularly
But right from the lanch function of “Bharat Swabhiman Mission”
where Babaji had invited a Shia Muslim maulaavi
and introduced him as his darling brother
speeches of Babaji has lost its sharpness
for the protection of desh, dharam, rajniti
Maybe its the price one has to pay
to garner support of all residing in india
and whether they are muslim
it does not matter
As a common hindu
what more could i have done but
only stopped actively watching Babaji
from that lanch function
though i still regard Babaji
as a great yoga master
and for his oratory skills
But, now in the present controvercy
of Devband fatva against Vande Mataram
attended by Babaji and home minister
hindus should protest and show their displeasure
to both Babaji and home minister
for agreeing to be a part of function
working against the spirit of Bharat
and consolidating/ fanning the Jihadi movement
As politicians support Jihadis
for capturing muslim vote bank
is Babaji trying to capture
muslim and sickular followers
by agreeing to attend Jihadi function
and not speacking out against
the fatva then and there
not even 2 days after that
all this when Babaji is
the most outspoken hindu guru
who is more than ready to
give sound bytes on each and every
topic including yoga
and never take any nonsense
laying down from any celebrited reporters/ editors
is it that like all other leaders
whether they are politicians or not
they are always supporting Jihadis
at the cost of hindus
and like them Babaji too
wants to capture muslim and sickular followers
and / or
even Babaji fears from Jihadis
O Hindus come out of your hibrenation
how long you want to wait
for things to get worse
before trying for their recovery
its easy to get charged up against Jihadis
but path to recovery goes first
by winning over the sickular hindus
O Hindus, this is the time
to lanch campainge against
all sickular hindus
in the form of Babaji
and dont wait for RSS/ BJP/ VHP
dont look forward for their orders
listen to your heart/ mind
Babaji has a reputation
of coming out sucessfully
from every controvery in the past
which where lanched by sickulars
but this time
if common hindus campainge
against his sickular tendencies
at least he has to say sorry
for his moments of weakness
i appeal all PRO-HINDU bloggers
to write-up on this topic from their heart
so that greater clearity and publicity to
hindu’s view emerage in media
also remember that
blogging alone cannot provide
answers to worldly problems.
http://hinduonline.blogspot.com/2009/11/original-post-no-4-o-hindus-come-out-of.html
.