ﻁ Ganga River Basin Authority | राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन | RASHTRIYA SWABHIMAN ANDOLAN

 

राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन | RASHTRIYA SWABHIMAN ANDOLAN

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गंगा के मामले में सरकार गंभीर नहीं

राजीव गांधी के जमाने में गंगा एक्शन प्लान की घोषणा से लेकर पिछली सरकार द्वारा गंगा को राष्ट्रीय नदी बनाने की घोषणा तक गंगा की सफाई के नाम पर जो भी सरकारी प्रयास हुए हैं, उन सभी का परिणाम निराशाजनक रहा है।अब नवगठित संप्रग सरकार ने पर्यावरण व वन मंत्रालय के अधीन गंगा नदी घाटी प्राधिकरण बनाने की जो पहल की है उसकी सफलता भी संदेह के घेरे में है।

 वास्तव में गंगा की सफाई का मामला केवल पर्यावरण व वन मंत्रालय से ही जुड़ा हुआ नहीं है। इसका संबंध सिंचाई, ऊर्जा, उद्योग, रोजगार, शहरी विकास एवं सुरक्षा जैसे कई अन्य मंत्रालयों से भी है। पर्यावरण मंत्रालय के पास इतनी ताकत नहीं है कि वह अन्य मंत्रालयों एवं सरकारी प्रतिष्ठानों की नकेल कस पाए। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि गंगा से जुड़े मुद्दों को सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के जिम्मे किया जाए। तभी कुछ उम्मीद की जा सकती है।

 नए पर्यावरण मंत्री के बयान से भी सरकार की नीयत को लेकर शंका उत्पन्न होती है। श्री जयराम रमेश ने पर्यावरण व वन मंत्री का पद संभालने के बाद अपने बयान में कहा कि विचाराधीन परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति देने के मार्ग में आ रहे अवरोधो को दूर करना उनकी पहली प्राथमिकता होगी।

 श्री जयराम रमेश ने यह भी कहा कि पर्यावरण मंत्रालय ‘मार्केट फ्रेंडली’ रहेगा। मंत्री जी का यह बयान अत्यंत आपत्तिजनक है। पर्यावरण मंत्री के नाते उनका जोर ‘पीपुल फ्रेंडली और एको फ्रेंडली’ होने पर रहना चाहिए। ऐसा लगता है कि वे बड़े थैलीशाहों और औद्योगिक घरानों की राह आसान करने के लिए ही मंत्री बने हैं। ऐसे में उनसे गंगा के उद्धार के लिए गंभीर प्रयास करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

 गंगा के उद्धार के लिए यदि सरकार गंभीर है तो उसे पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों, साधु-संतों, वैज्ञानिकों और गंगा से सरोकार रखने वालों को भी प्राधिकरण में शामिल करना चाहिए। ऐसे लोगों की संख्या प्राधिकरण में आधे से अधिक होनी चाहिए। जब तक ये लोग शामिल नहीं होंगे तब तक ‘अविरल गंगा निर्मल गंगा’ लक्ष्य के अंतर्गत सभी पहलू सामने नहीं आ पाएंगे।

 गंगा प्रवाह क्षेत्र में आने वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सरकारी अधिकारियों को मिलाकर बने प्राधिकरण का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इसमें शामिल लोगों की प्राथमिकता में ‘अविरल गंगा निर्मल गंगा’ का मुद्दा बहुत पीछे रहेगा। गंगा को लेकर जो भी प्राधिकरण बने, उसके संघटन में यदि सावधानी नहीं बरती गयी तो निश्चित रूप से यह भी पिछले प्रयासों की तरह पैसे की हिस्सेदारी और बंदरबांट का अड्डा बन जाएगा।

 इसी के साथ नवगठित सरकार की जिम्मेदारी है कि वह गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किए जाने के बाद आगे की अपनी योजनाओं के बारे में बताए। वह बताए कि इस घोषणा के तहत उसकी जिम्मेदारी क्या होगी? उसके लक्ष्य क्या होंगे? उसे बताना होगा कि उसका लक्ष्य केवल गंगा की सफाई का ढोंग करना है, या वह अविरल गंगा निर्मल गंगा के पक्ष में गंभीरता पूर्वक काम करना चाहती है।

 यदि सरकार ने ऐसा नहीं किया तो माना जाएगा कि सरकार गंगा के मामले में जनता को धोखा दे रही है। लोग ऐसा न समझें, इसके लिए सरकार शीघ्र कदम उठाए ताकि राष्ट्रीय नदी का स्वरूप नैसर्गिक और स्वच्छ बना रहे। उसका धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बना रहे।

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2 Responses to “गंगा के मामले में सरकार गंभीर नहीं”

  1. gaurav says:

    ya sali congress party aur baki party jo apna apko deshbhakt kehti hai ye sab saali gaddar hai.bharat ko bharat swabiman andolan poori tarah se badal dega

  2. rohit says:

    all d political party using evrythinng for there convinience they r not botherd abt INDIA
    so there is swabhiman andolan is only option to save INDIA n their respect

    ur
    rohit