कब तक अपमान का घूंट पीते रहेंगे हम?
पाकिस्तान के साथ बातचीत का सिलसिला चलाने के लिए हमारी सरकार इस कदर बिछे जा रही है कि उसे बड़े से बड़ा अपमान भी नज़र नहीं आता। पाकिस्तान की यात्रा पर गए विदेश मंत्री एस एम कृष्णा के साथ पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी का बर्ताव ये साफ ज़ाहिर करता है कि पाकिस्तान के साथ संबंध बनाने और बढ़ाने पर हमें अभी और सोचने की ज़रूरत है…और सरकार जल्दबाज़ी में है। ये जल्दबाज़ी जितनी जल्दी हो…ख़त्म होनी चाहिए।
पड़ोसी मुल्कों के साथ बेहतर संबंध भारत से ज़्यादा दुनिया में कोई और देश नहीं चाहता लेकिन ये सब अगर स्वाभिमान की क़ीमत पर तो फिर सब कुछ बेमतलब है। इन दिनों हो यही रहा है। ये कोई पहली बार नहीं है कि जब पाकिस्तान कूटनीतिक शिष्टाचार तक भूल गया। पिछली दफा जब इस साल की शुरूआत में पाक विदेश सचिव नई दिल्ली के दौरे पर थे…तो उन्होंने पाकिस्तानी दूतावास में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में कुछ इसी तरह के तेवर दिखाए थे।
दरअसल पाकिस्तान ये संकेत देना चाहता है कि वो भारत की किसी तरह की आपत्ति को लेकर कतई गंभीर नहीं। वो ये जताना चाहता है कि हम तो यूं ही बने रहेंगे….बदलना है तो भारत बदले। और जवाब में हम बिछे जा रहे हैं। किसी भी हाल में पाकिस्तान के साथ संबंधों को बेहतर बनाने की इस जल्दबाज़ी का आख़िर मतलब क्या है?
मुंबई हमले के आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचाना तो दूर…पाकिस्तान ने इसको लेकर सौंपे गए दस्तावेजों को लेकर ही मज़ाक बनाना शुरू कर दिया और ये आज भी जारी है। आख़िर जब हमारा पड़ोसी मुल्क सामान्य गंभीरता भी नहीं दिखा रहा..ज़ुबानी बातें करने में भी सलीके से पेश नहीं आ रहा…तो फिर उसके साथ बेहतर संबंध किस बिना पर बनेंगे? क्या उसके पीछे-पीछे ये कहते हुए हमें भागना चाहिए कि आप चाहे जो कहो…हम आपके साथ अच्छा संबंध चाहते हैं। अगर सरकार इससे इनकार करती है..तो फिर वो पाकिस्तान को दो टूक जवाब क्यों नहीं देती?
क्या हाथ मिलाते वक़्त हम पाकिस्तान को ये अहसास कराने में नाकाम हैं…कि ज़रूरत आने पर ये हाथ दुश्मन देश की कलाई को उतनी ही मज़बूती के साथ मरोड़ भी सकते हैं? शायद नहीं…अगर ऐसा होता तो इस कदर पाकिस्तान लगातार हमारे प्रतिनिधियों की बेइज़्ज़ती नहीं कर रहा होता। नई दिल्ली से इस्लामाबाद तक वो लगातार यही कर रहा है..बावजूद इसके हमारी सरकार की नींद नहीं खुल रही। ऐसा जितना जल्दी हो उतना ही अच्छा है…वरना जनता शायद ही बार-बार की ये बेइज़्ज़ती सहन करेगी।
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its very true