ﻁ नानाजी का प्रयाण | राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन | RASHTRIYA SWABHIMAN ANDOLAN

 

राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन | RASHTRIYA SWABHIMAN ANDOLAN

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नानाजी का प्रयाण

नानाजी देशमुख नहीं रहे। देशभर में लाखों लोग ये ख़बर सुनते ही स्तब्ध रह गए। इसलिए नहीं कि नानाजी हमें छोड़कर चले गए बल्कि इसलिए क्योंकि नानाजी के जाने से ख़ाली हुआ स्थान अब कैसे भरेगा? जीवन,..मृत्यु से अछूता नहीं रह सकता। एक की समाप्ति से दूसरे की शुरूआत होती है। इसलिए नानाजी का प्रयाण अविश्वसनीय नहीं था। 94 साल की उम्र में नानाजी का निधन हुआ…जीवन के इस पड़ाव पर भी वो मानसिक रूप से उतने ही सक्रिय थे…जितने सालों पहले। जिस उम्र में राजनेता ख़ुद को युवा बताते हैं…उस उम्र में नानाजी ने राजनीति को अलविदा कहकर समाजसेवा का रास्ता चुना था और ताउम्र आगे बढ़ते रहे। उनके जीवन का उत्तरार्ध कभी आया ही नहीं….आई तो बस मृत्यु। क्योंकि नानाजी को लड़ाई में हराना काल के भी बस की बात नहीं थी। 27 फरवरी….शनिवार को अचानक सीने में दर्द उठा और इसके कुछ समय बाद उन्होंने सबको अलविदा कह दिया।

जीवन भर शरीर को देश और समाज के चिंतन के लिए साधते रहे…तो मृत्यु के बाद भी शरीर को विश्राम लेने नहीं दिया। नश्वर शरीर को सार्थक उद्देश्य के लिए दान करने का उन्होंने प्रण लिया था। जिसे पूरा किया गया। सतना में देहावसान के एक दिन बाद नानाजी का शव दिल्ली लाया गया….और यहां संघ कार्यालय केशवकुंज में दो घंटे के लिए आम लोगों के दर्शनार्थ रखा गया। इसके बाद पार्थिव शरीर को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया। महाराष्ट्र के परभनी ज़िले के कडोली में 11 अक्टूबर 1916 को नानाजी का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम चंडिकादास अमृतराव देशमुख था। नानाजी का बचपन अभावों में बीता था और उन्होंने बमुश्किल अपनी पढ़ाई पूरी की थी। पढ़ने में मेधावी नानाजी बिड़ला इस्टीट्यूट्स, पिलानी के भी छात्र रहे। जहां पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने संघ के कार्यों में अपना जीवन लगा दिया। यूपी के अलावा नानाजी ने राजस्थान में भी संघकार्य किया था। यूपी में गोरखपुर और आगरा में नानाजी ने लंबे समय तक काम किया।

बाद में नानाजी को भारतीय जनसंघ के संगठन का दायित्व सौंपा गया। जिसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश में जनसंघ को मज़बूत संगठन खड़ा किया। ग़ैर कांग्रेसी दलों को एकमंच पर लाने में नानाजी का बड़ा योगदान था। उनके राममनोहर लोहिया से मधुर संबंध थे। देश में राजनैतिक आंदोलन के ज़रिए बदलाव लाने का जब जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन शुरू किया तो नानाजी इसके प्रमुख नेताओं में एक थे। जयप्रकाश नारायण के साथ उन्होंने आंदोलन की रीति-नीति तय की और हमेशा अंग्रिम पंक्ति के नेता रहे। जनता पार्टी के गठन में उनकी भूमिका काफी अहम रही। पटना में आंदोलन के दौरान तब जेपी पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया था…जिस दौरान नानाजी ने ग़ज़ब का साहस दिखाया था। उन्होंने जेपी के ऊपर बरसने वाली लाठियों को अपने शरीर पर झेल लिया था लेकिन अपने नेता पर आंच नहीं आने दी थी।

 1977 के चुनाव में वे उत्तर प्रदेश की बलरामपुर सीट से सांसद चुने गए। इस आमचुनाव में कॉंग्रेस की करारी हार हुई थी और केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनने का रास्ता साफ हुआ। तब प्रधानमंत्री मोरारजीभाई देसाई ने नानाजी से मंत्रिमंडल में शामिल होने का अनुरोध किया था लेकिन नानाजी ने इसे विनम्रता से ठुकरा दिया। इसके कुछ ही साल बाद 1980 में नानाजी ने राजनीति से ख़ुद को अलग कर लिया। नानाजी अपने बारे में सबकुछ भूलकर सिर्फ समाज के लिए जीना चाहते थे…ऐसी किसी भी व्यवस्था या स्थिति में वो ख़ुद को सहज नहीं पाते थे जहां अपने बारे में ज़्यादा सोचना पड़े। नानाजी का कहना था कि राजनेताओं को 60 साल के बाद  राजनीति छोड़ देनी चाहिए। वे रचनात्मक कार्यों को बेहद ज़रूरी मानते थे।

इसी उद्देश्य से नानाजी ने चित्रकूट में देश के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय…ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की। ये बीहड़ों में ज्ञान का ज्योतिपुंज साबित हो रहा है। आज इस विश्वविद्यालय में हज़ारों छात्र पढ़ते हैं। जिनमें ज़्यादातर साधनविहीन और निर्धन परिवारों से आते हैं। इस विश्वविद्यालय की ख्याति अब देशभर में फैल चुकी है। नानाजी राजनीति से अलग होने के बाद यहीं रहते थे। यहां ग्राम विकास से लेकर लोगों को स्वाबलंबी बनाने के कई प्रकल्प संचालित होते हैं। 1999 में नानाजी को पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। समाजसेवा के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें राज्यसभा के लिए भी मनोनीत किया गया। नानाजी एक आदर्श स्वयंसेवक रहे….जिनकी सादगी और ईमानदारी की मिसाल हर विचार परिवार के लोग देते रहे। राज्यसभा के सांसद के रूप में नानाजी ने सासंदों के वेतन और भत्ते बढ़ाए जाने का मुखर विरोध किया था। ऐसा करने वाले वे अकेले सांसद थे। नानाजी हमेशा ये कहते रहे कि राजनेताओं को समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की तरह जीवन जीना चाहिए। अगर इस एक संदेश को राजनेता अपने जीवन में अपना लें तो फिर देश की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।

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2 Responses to “नानाजी का प्रयाण”

  1. kunal says:

    very nice, but this BJp is not at all going on this way, second why this RSS is attaced with BJP. all RSS people good one but if they come in BJP then becomes bad. otherwise BJP will make out like Govindachri ji. so how we can change it. all are running after money. make such place where honest people can work.

  2. kunal says:

    i hae done