कैसी हो भारतपरस्त और गरीबपरस्त नीति?
राष्ट्रवादी दृष्टिपत्र का लोकार्पण
15 जनवरी की शाम को नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब का सभागार खचाखच भरा था। मौक़ा था राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के राष्ट्रवादी दृष्टिपत्र के प्रारंभिक प्रारूप पर चर्चा का। इस कार्यक्रम में इस दृष्टिपत्र का लोकार्पण भी हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने की। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संस्थापक के एन गोविंदाचार्य ने इस प्रारुप के उद्देश्य को सबसे सामने रखा। इस प्रारंभिक प्रारूप पर संवाद की प्रक्रिया 2009 की विजयदशमी से ही शुरू थी,..जो इस साल की मकर संक्रान्ति तक चली। देश भर से इस पर सुझाव आमंत्रित किए गए थे। जिसके मुताबिक इस प्रारूप का परिमार्जन किया जाना है। कार्यक्रम को प्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय और अवधेश कुमार ने भी संबोधित किया। इस मौक़े पर भारत विकास संगम के संयोजक बासवराज पाटिल ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम में लोकसभा के पूर्व महासचिव सी के जैन, सर्वोदयी नेता अयूब जी, जम्मू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक अजय शिंगू और राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के सह-संयोजक कैलाश तिवारी ने भी अपनी बातें रखीं।
ज़बर्दस्त जनांदोलन की ज़रूरत : वेदप्रताप वैदिक, प्रसिद्ध पत्रकार
यहां जो दृष्टिपत्र प्रस्तुत किया गया है वो राजनीतिक दलों के घोषणापत्र जैसा लगता है, हालांकि भाषा के मामले में मैं इसकी प्रशंसा करता हूं। मैंने सालों से इस तरह की किसी सभा में शिरकत नहीं की थी, यहां इसलिए आया क्योंकि ये बोलते, पढ़ते और करते लोगों की सभा है। सार्वजनिक जीवन में मुझे 52 साल हो गए। 13 साल मे मैं जेल गया था। देश की राजनीति को बेहद क़रीब से देखा। आज की स्थिति की बात करें तो ये निराश करनेवाली है। मैं इस कार्यक्रम में गोविंदाचार्य की वजह से आया। इनके आग्रह को स्वीकार करना ही पड़ा। गोविंदाचार्य अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो देश की राजनीतिक जड़ता को भंग कर सकते हैं। आज के नेता अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से ही दूर हैं। नेता वो होता है जिसके दरवाज़े सभी के लिए हमेशा खुले रहें। लेकिन इस कसौटी पर बड़े कहे जाने वाले नेता भी खरे नहीं उतरते। जो लोग बड़े कहे जाते हैं वो लोग बड़े नहीं हैं, वे बस कुर्सियों पर बैठे लोग भर हैं जिनकी ख़ुद की क़ीमत कुर्सियों जितनी भी नहीं। जिन्होंने कागज़ पर लिखा तो कागज़ बेकार किया,…कुर्सी पर बैठे तो कुर्सी बेकार किया। राजनीतिक दलों की पहचान भी बदल गई है, अब ये विचारधारा के आधार पर नहीं पहचानी जाती बल्कि इनमें सो कोई वंशवादी कहला रहा है तो कोई मुट्ठीवादी। मुट्ठीवादी इसलिए कि दल के मुट्ठीभर लोग ही पार्टी की रीति-नीति तय करते हैं और जो राजनैतिक प्रतिभाओं को क़त्ल करने में उस्ताद हैं। आज देश के राष्ट्रीय कहे जाने वाले दलों की क्या हालत है? इनमें से किसी की भी देश के तकरीबन 550 ज़िलों में शाखाएं तक नहीं हैं। ऐसे में ये देश को कितना समझेंगे या फिर ये मुद्दों का चुनाव कैसे करेंगे? लेकिन सब कुछ ऐसे ही चल रहा है। राजनीति शिवजी की बारात की तरह है जिसमें हर तरह के लोग शामिल होते हैं, अगर इसमें शामिल होना है तो इन सबके साथ ही चलना पड़ेगा। आप चाह कर भी अलग नहीं रह सकते। सबको संभालना भी आसान नहीं होता इसमें बड़ी ऊर्जा ख़त्म होती है। लोहिया ने कहा था सत्ता पहला धर्म है इसके बिना राजनीति व्यर्थ है। इसलिए राजनीति में आने के बाद सत्ता को अपनी सोच में शामिल करना ही होता है। बिना वाद और प्रतिवाद के संवाद नहीं होता लेकिन दुर्भाग्य इस बात का है कि आज देश में कोई विरोधी दल ही नहीं है। हिन्दुस्तान में राजनीति एकआयामी हो गई है। ये ख़तरनाक स्थिति है। हिन्दुस्तान के लोग प्रॉक्सी पॉलिटिक्स कब तक बर्दाश्त करेंगे। देशभर में इस वक़्त ज़बर्दस्त जनांदोलन की ज़रूरत है।
99 प्रतिशत सुधार की गुंजाइश : के एन गोविंदाचार्य, संस्थापक, राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन
15 मई 2004 को राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन का गठन दिल्ली में हुआ था। तब एक विदेशी महिला के प्रधानमंत्री बनने की स्थिति बन रही थी। सौभाग्य से ऐसा नहीं हुआ लेकिन राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के गठन का ये तात्कालिक आधार नहीं था। सोचने वाली बात ये थी कि आख़िर देश में ऐसी स्थिति बनी ही क्यों? हमारा स्वाभिमान आख़िर इतना ऊंचा क्यों नहीं रहा कि ऐसी हालत पैदा हुई? चुनौती कई तरह की है। आज वंशवाद को युवा नेतृत्व के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है। वैचारिक आधार पर बने दल भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जैसे दिखते हैं। युवा होने का मापदंड उम्र नहीं हो सकता। संकल्प, बलिदान और साहस सिर्फ उम्र पर निर्भर नहीं करते। आज हमारी राष्ट्रीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष सभी का चरित्र एक जैसा होता जा रहा है। ऐसे में राजनीति में मूल्यों और मुद्दों को कैसे वापस लाया जाय? ये अहम सवाल है।
चुनौती हर स्तर पर है और हमें सबसे निबटना है। चुनाव के समय नोट से वोट और वोट से नोट का खेल हावी दिखा। कई मीडिया घराने राजनीतिक दलों से मिले पैकेज के मुताबिक़ काम करते नज़र आए। ये ख़तरनाक स्थिति है। अगर मीडिया पैसे के लिए दल विशेष के हित के लिए काम करने लगें तो स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जाएगी। ऐसे में चुनाव आयोग को सशक्त बनाया जाना बेहद ज़रूरी है। आज सत्ता के लिए समाज का हित अहम नहीं है। इस हालत को बदलना होगा। अगर सत्ता की सोच की जगह समाज के लिए राजनीतिक दल सोचने लगें तो ऐसा हो सकता है। वंचित, पीड़ित और उपेक्षित ही हमारे अपने हैं। अपने लिए नहीं अपनों के लिए सोचने की ज़रूरत है। आज ज़मीनी मुद्दे राजनीतिक परिदृश्य से ग़ायब हो गए हैं। गोवंश संरक्षण से लेकर खेती से जुड़े मुद्दों को तवज्जो नहीं मिल रही। सालों पहले से हालात बिल्कुल बदल चुके हैं। हमारा स्वाबलंबन ख़त्म हो चुका है। इसके ज़िम्मेदार सभी हैं। विकास की अंधी रफ्तार में कई बातें ग़ुम होती गईं और उस तरफ हमारा ध्यान ही नहीं गया। आख़िर घोड़े कहां गए? उसे तो किसी कसाई ने नहीं मारा लेकिन उनकी संख्या बेहद कम हो गई है। हमारा विकास प्रकृतिमूलक नहीं है, सही मायने में ये प्रगतिमूलक भी नहीं है। सबसे दुखद बात ये है कि ये हमारे लिए मुद्दा ही नहीं है।
अध्ययन अवकाश के दौरान ये मत बना था कि हालात को बदलने के लिए हर स्तर पर काम आगे बढ़े। बौद्धिक स्तर पर, रचानात्मक स्तर पर और आंदोलनात्मक स्तर पर। समग्र शोध संस्थान और भारत विकास संगम इस दिशा में निरंतर गतिशील हैं। आज राजनीति की तारक शक्ति घटी है और मारक शक्ति बढ़ गई है। ऐसा समाज से सत्ता के घटते सरोकार की वजह से हुआ है। विपक्ष की कमज़ोर भूमिका भी इसकी वजह है। विपक्ष का काम गोलकीपर की तरह है जो सत्तापक्ष की मनमानी पर अंकुश लगाता है और गोल बचाता है। मौक़ा मिलने पर विपक्ष जनता के लिए सत्ता पक्ष की तरफ गोल दागता भी है लेकिन मौजूदा समय में उसके भिड़ने की क्षमता चूक गई है। आज सत्ता पक्ष और विपक्ष आपस में मिले हुए दिखाई देते हैं। ये स्थिति बदलनी चाहिए। गोल कौन करे,…ये महत्व की बात नहीं है बस गोल होना चाहिए। वर्तमान स्थिति में भारतपरस्त और ग़रीबपरस्त राजनीति की ज़रूरत बढ़ गई है…और इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ये दृष्टिपत्र आप सबके सामने प्रस्तुत किया गया है। ये बस प्रारंभिक प्रारूप है इसमें सुधार की 99 प्रतिशत गुंजाइश है। ये चर्चा इसी के निमित्त है। हमें सभी का साथ लेकर आगे बढ़ना है। इसलिए इसे समाज के हर क्षेत्र के लोगों के पास भेजा गया है,…हमें लगातार सुझाव मिल रहे हैं…और इसका आगे भी इंतज़ार रहेगा।
नए औज़ार की ज़रूरत है : रामबहादुर राय, वरिष्ठ पत्रकार
यहां हो रही चर्चा को सुनकर लगता है कि हम ‘अनुशासन पर्व’ की तरफ बढ़ रहे हैं। मुझे समस्याओं पर निषेधात्मक या नेगेटिव सोच की ज़रूरत नज़र आती है। हम जब नकारात्मक सोचेंगे तो लड़ने का माद्दा पैदा होगा और जब हम सकारात्मक सोचेंगे तो फिर अनुकूलीकरण की तरफ बढ़ने लगेंगे। हमें नई संविधान सभा के गठन की मांग को आगे बढ़ाना होगा। हम इसके लिए लड़ेंगे। मौजूदा परिस्थिति 1946 जैसी नहीं है। आज बहुत बड़े बदलाव की ज़रूरत है। हमारी समस्याओं की जड़ बहुत हद तक पुरानी व्यवस्था में ही छिपी हुई है। इसलिए इसे बदलना ज़रूरी है। आज के राजनीतिक दल सत्तावादी हो गए हैं उन्हें बस ख़ुद से मतलब है, वे इन विषयों के बारे में नहीं सोचते।
आज के दौर में जो समस्याएं खड़ी हो गई हैं उसके ख़िलाफ़ लड़कर उसे परास्त करके हमें नई व्यवस्था लागू करनी होगी। सिर्फ ये कहने से काम नहीं चलेगा कि गोल किया जाना ज़रूरी है। इसकी ज़रूरत है तो गोल करने ख़ुद आगे आईए। वर्तमान समस्याओं से लड़ने के लिए नए औज़ार की ज़रूरत है। एक ऐसे राजनीतिक दल की ज़रूरत है जो मौजूदा समस्याओं के समाधान का औज़ार बने। हर क्षण अनंत होता है, उसमें एक अनंतता होती है। मैं चाहूंगा कि इसी चर्चा में इसकी घोषणा हो। लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय और जेपी में जो सद्गुण थे वे मुझे गोविंदाचार्य में नज़र आते हैं। इसलिए उन्हें आगे आना ही चाहिए। जो दृष्टिपत्र सामने रखा गया है वो घोषणापत्र जैसा है, इसमें ज़्यादातर बातें औपचारिक हैं। इसमें काफी सुधार की संभावना है। इसकी भाषा में वो बोध नहीं है जो हमें नई व्यवस्था के लिए तैयार कर सके। हमें अब कुछ करने पर ज़ोर देना चाहिए।
हमें जगना होगा : अवधेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
ये दृष्टिपत्र उम्मीदें नहीं जगाता। इसमें उन कई मुद्दों का ज़िक्र नही है जो देश के सामने की बड़ी चुनौतियों में से एक है। अगर देश की बात करें…तो उसकी स्थिति मौजूदा समय में उस व्यस्ततम ट्रैफिक सिग्नल की तरह है जहां कि बत्ती अचानक ग़ुम हो गई है। जिसकी वजह से सारी गाड़ियां एक जगह आकर या तो ठहर गई हैं या फिर आपस में ही भिड़ने को तैयार हैं। बत्ती जब जलेगी तब अचानक सभी मुश्किलें आसान हो जाएंगी। ज़रूरत इसी बत्ती की है। हमारे विकास का मॉडल पर्यावरण के हित में नहीं है। हम पश्चिमी देशों से अलग नहीं हैं। कोपेनहेगन में भारत की ताज़ा भूमिका से साबित हो गया कि हम भी अब सिर्फ और सिर्फ अपना हित देखना सीख गए हैं। ग्लोबल वार्मिंग, जिसे हम धरती का बुखार कहते हैं वो लगातार बढ़ रहा है। भारत में भी स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। पिछले 10 सालों में भारत में प्रदूषण का स्तर 65 प्रतिशत बढ़ गया है। ये कैसा विकास है और इस विकास के रास्ते पर हम कितना आगे बढ़ पाएंगे? भारत के पुनर्निमाण में ही दुनिया का भविष्य है इसलिए हमें जगना होगा वर्ना बहुत देर हो जाएगी।
भारत का ‘राज्य’, ..‘राष्ट्र‘ से विमुख : अजय शिंगू, प्राध्यापक, जम्मू विश्वविद्यालय
राष्ट्रवादी दृष्टिपत्र में बहुत से अहम मुद्दों की चर्चा है। देश की राजनीति इंडिया की बजाय भारतपरस्त और ग़रीबपरस्त हो, ये ज़रूरी है। आज दिखता यही है कि भारत का ‘राज्य’, ..‘राष्ट्र‘ से विमुख है। सीमावर्ती इलाक़ों में बसे लोगों की मुश्किलों से सरकार अंजान बनी रहती है। वहां किस तरह आतंक का साया दिनोंदिन मज़बूत होता जा रहा है? इस पर सरकार का ध्यान नहीं है। आख़िर ऐसा बेगानापन क्यों है?
शब्द नहीं व्यक्तित्व बोलता है : अयूब जी, सर्वोदयी नेता
भारतीय संस्कृति त्यागमूलक रही है लेकिन वर्तमान परिदृश्य से लगता है कि हमारा आकर्षण भोगमूलक संस्कृति की तरफ ज़्यादा है। कपिल, कणाद और दधीचि से हमारी संस्कृति जानी जाती रही है। हमारा इतिहास ऐसे ही महापुरूषों के प्रकाश से प्रकाशित है लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। देश की राजनीति में जो नेतृत्वकर्ता की भूमिका में हैं उनका व्यक्तित्व आमलोगों से समरस नहीं है। गांधीजी ने जब राजनीति में उतरने का फैसला किया तो सबसे पहले लोकजीवन से ख़ुद को समरस किया। इसी वजह से उनकी बातें समाज के अंतिम व्यक्ति तक को प्रभावित करती थीं। सच तो ये है कि शब्द नहीं व्यक्तित्व बोलता है। राजनीति से देश के बहुआयामी विकास की अपेक्षा अब लोग नहीं करते क्योंकि राजनेताओं की दिशा अलग है, उनका मक़सद अलग दिखता है। जब तक राजनेता अपने जीवन को नहीं साधेंगे उनकी बातों का असर नहीं होगा। आम लोगों को अपने साथ लाने के लिए उनके साथ समरस होना पड़ेगा। कथनी और करनी के बीच का अंतर ख़त्म किए बिना ये संभव नहीं है। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन का प्रयास सही दिशा में है और इस राष्ट्रवादी दृष्टिपत्र में अहम बातों का समावेश दिखता है।
आपस में जुड़े हैं लोग : कैलाश तिवारी, सह-संयोजक, रा. स्वा. आंदोलन
राष्ट्र की निरंतरता के ताने-बाने से लोग आपस में जुड़े हैं । धर्म, जाति और भाषा की बातें एक सीमा तक ही हावी दिखती हैं। इससे आगे सभी एकता के सूत्र में बंधे हैं। इसे मज़बूत बनाने के काम को आगे बढ़ाना हमारा लक्ष्य है। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन इस दिशा में काम कर रहा है। अमीर और ग़रीब भारत के बीच का अंतर बड़ा है। शायद ये भारतपरस्त नीतियों के अभाव की वजह से है, जहां हम सिर्फ नज़र आने वाली चीज़ों को देखते हैं और हालात की वजहों को जानने की कोशिश नहीं करते। हमारी कोशिश इसे पाटने की है।
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