राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन

हमारे बारे में

राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन भारत की सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाओं से उपजे मौलिक प्रश्नों का उत्तर तलाशने में सक्रिय विचारकों और कार्यकर्ताओं का एक लचीला संगठन है। आन्दोलन द्वारा सर्वस्वीकृत मूल्यों, मुद्दों और लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के कार्यकर्ताओं की श्रेष्ठता की कसौटी है। जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि का किसी भी प्रकार का विभाजक रुप इसमें मान्य नही है।

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की स्थापना का लक्ष्य है “व्यवस्था परिवर्तन”। भारत की वर्तमान राजनीतिक तथा आर्थिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन और भारत-परस्त गरीब-परस्त व्यवस्था की स्थापना ही राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन का एकमात्र लक्ष्य है। आन्दोलन की समस्त गतिविधियाँ रणनीति आदि इसी शीर्षक के अंतर्गत परिस्थिति और समयानुसार परिभाषित व कार्यान्वित होती रहेंगी। वर्तमान में देश और समाज की जो नाजुक दशा है उसमें राष्ट्रीय एकता-अखंडता के खतरे से लेकर सामाजिक बिखराव तक से इंकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने जैसे दुधारी रास्ते से बचना ही अधिकांश विचारशील नेता श्रेयस्कर मानते हैं। उनका मानना है कि वर्तमान व्यवस्था में ढांचागत और नीतिगत बड़े-बड़े बदलाव तथा सुधार करके भी हमें वांछित परिवर्तन प्राप्त हो जाएगा।

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की स्थापना का लक्ष्य है “व्यवस्था परिवर्तन”। भारत की वर्तमान राजनीतिक तथा आर्थिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन और भारत-परस्त गरीब-परस्त व्यवस्था की स्थापना ही राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन का एकमात्र लक्ष्य है। आन्दोलन की समस्त गतिविधियाँ रणनीति आदि इसी शीर्षक के अंतर्गत परिस्थिति और समयानुसार परिभाषित व कार्यान्वित होती रहेंगी। वर्तमान में देश और समाज की जो नाजुक दशा है उसमें राष्ट्रीय एकता-अखंडता के खतरे से लेकर सामाजिक बिखराव तक से इंकार नहीं किया जा सकता है।

ऐसे में व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने जैसे दुधारी रास्ते से बचना ही अधिकांश विचारशील नेता श्रेयस्कर मानते हैं। उनका मानना है कि वर्तमान व्यवस्था में ढांचागत और नीतिगत बड़े-बड़े बदलाव तथा सुधार करके भी हमें वांछित परिवर्तन प्राप्त हो जाएगा। देश और समाज की संवेदनशील परिस्थिति से अवगत होने के कारण फिलहाल राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन दूसरे रास्ते को वरणीय मानता है। माननीय जयप्रकाश नारायण जी की संपूर्ण क्रांति से 1977 में हुआ सत्ता परिवर्तन,बोफोर्स घोटाले के आधार पर हुआ सत्ता परिवर्तन तथा 1998 में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम से सत्ता परिवर्तन हुआ था। तीनो बार का सत्ता परिवर्तन स्थापित व्यवस्था में स्थायी परिवर्तन करने में भी नाकामयाब रहा।

इस असफलता के पीछे मूल कारण था पहले से व्यवस्था परिवर्तन का मूर्त खाका न होना। इन ऐतिहासिक भूलों से सीख लेते हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन अपना अंगीकृत कर्तव्य मानता है कि व्यवस्था परिवर्तन के मौलिक विषयों पर हमारा मूर्त खाका यथाशीघ्र तैयार हो तथा संगठन में सर्वस्वीकृत होकर सर्वज्ञात हो। देश की राज्य और अर्थ व्यवस्था में बदलाव के लिए आन्दोलन और अभियान चलाना राजनैतिक परिधि में आते हैं। अत: राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन भी स्वाभाविक रूप से एक राजनैतिक संस्था है,पर वह चुनावी संगठन नहीं है। चुनावों में हिस्सा लेने से हमें परहेज़ भी नहीं है,अगर व्यवस्था परिवर्तन के लिए चुनावी राजनीति अपरिहार्य हो जाती है तो वह विकल्प भी खुला है।

व्यवस्था परिवर्तन से हम चाहते है- प्रत्येक व्यक्ति को मेहनत की रोटी और इज्जत की जिंदगी सुलभ हो तथा हमारा भारत विश्व में गौरवशाली पद पर प्रतिष्ठित हो। हमें यहीं नहीं रुकना है, हमे दुनिया को कुछ देने का भी सामर्थ्य पाना है। इसके लिये हमें भारतीय जीवन दृष्टि पर आधारित विकास मार्ग अपनाना होगा। विगत 500 वर्षो से चले आये प्रकृति के शोषण पर आधारित मानव केन्द्रित विकास के स्थान पर प्रकृति के साथ संतुलन बिठाकर विकास का रास्ता अपनाना होगा। प्रकृति के साथ संतुलन भी पश्चिम के एकांगी भौतिक विकास से प्राप्त समृद्धि में संभव नहीं। इसके लिये समृद्धि और संस्कृति के समन्वित संवर्धन से प्राप्त समग्र विकास ही रास्ता है। यह समग्र विकास ही हमारे व्यवस्था परिवर्तन का अधिष्ठान रहेगा।

जब हम विकास की बात करते है तो प्राय: हम विकास को अमेरिकी अवधारणा की ही दोहराने लगते हैं। हम भूल जाते है कि विकास के संदर्भ में .भारत की भी एक सोच रही है। भारत ही क्या , दुनिया के प्रत्येक कोने में विकास की व्याख्या अलग-अलग ढंग से की गई हैं।