राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन

विषयगत कार्य

15 मई 2004 को राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की शुरूआत हुई,काल क्रमेण समझ बनती गई कि देश की तासीर,तेवर और जरूरत के हिसाब से राजनैतिक एवं आर्थिक व्यवस्था गढ़े जाने की जरूरत है। विगत् 200 वर्षो से उपनिवेशवाद के हितसाघन के उट्वेश्य से देश की आर्थिक,राजनैतिक व्यवस्था चलाने का प्रयत्न हुआ। आजादी के बाद भी व्यवस्था वही रही। संविधान में भारत की सभ्यता मूलक विक्षेपता यथा;धर्मसत्ता का महत्व,परिवार संस्था,जाति,समुदाय की अस्मिताओं का योगदान,बचत, त्याग,अभौतिक जीवन मूल्य जैसे तत्वों को योग्य महत्व नहीं मिला। फलत: राज़नीति और अर्थनीति भारतीय जन से कटती गई। भारत की अभीप्सा को संतुष्ट करने के लिए राजनैतिक,आर्थिक व्यवस्था समीचीन नहीं बन पाई। देशी सोच एवं विकेंद्रीकरण के पाये पर व्यवस्थाएं विकसित नहीं हो सकी। संस्कृति और समृद्धि का संतुलन नहीं सधा।

भारत के नीति नियामकों ने भारत को यूरोप के नजरिए से देखने व समझने की कोशिश की। इसके कारण वे भारतीय जन की ताकत,उसके उपादान आदि को कमजोरी मान बैठे। वे रूस,अमेरिका,चीन को अनुकरणीय मानकर विकास की अधूरी समझ एवं एकांगी मापदण्ड के नैतिक,आर्थिक व्यवस्थाओं,नीतियों को ही व्यवहार में लाते रहे है। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन का मानना है कि चराचर सृष्टि की कुछ मूल इकाइयों के स्वरूप और अंतर संबंधों की समझ ही दर्शन का महत्वपूर्ण तत्व है। जीव,जगत,जगदीश ये वे मूल इकाइयां है जो दर्शन की समझ के आधार से ही विचारधाराएं उपजाती है। विचार धाराओं से जीवन-लक्ष्य, जीवन-मूल्य जीवनादर्श,जीवन-शैली की समझ बनती जाती है।

उस समझ से ही समाज रचना एवं राजनैतिक व्यवस्था एवं अर्थव्यवस्थाएं गढ़ी जाती है। भारत में धर्मसत्ता, समाजसत्ता, राजसत्ता और अर्थसता द्वारा समाज संचालन की व्यवस्था का यही कारण है। भारत में समाज रिश्तों से बना हुआ है है न कि शर्तों से। सत्ता से नहीं संस्कारो से। संस्कृति की भित्ति पर समृद्धि उपलब्ध हो,यह भारतीय सोच है। अत: उपर्युक्त व्यवस्था परिवर्तन को राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन ने लक्ष्य माना है। इस अनुसार जनचेतना समझ,हिस्सेदारी,जन-संघर्ष,जन-दबाब का लोकतांत्रिक मार्ग चुना गया है। विगत वर्षों में विकास की समझ बढाने की कवायद शुरू हुई है। व्यवस्था परिवर्तन तक मुहिम जा सके,ऐसे मूलग्राही मुदृदे उठाए गए है।

यथा-

1. अविरल गंगा- निर्मल गंगा।
2. गोवंश हत्याबंदी द्वारा देश की समृद्धि एवं संस्कृति के लिए पर्यावरणीय,आर्थिक,सामाजिक योगदान के पहलू।
3. भ्रष्टाचार उन्मूलन एवं विदेशों में जमा अवैध धन को वापसी का मुद्दा।
4. राजनैतिक एवं चुनाव सुधार
5. केंद्रीय बजट का 7 % सीधे पंचायतो को मिले
6. न्यायपालिका क्षेत्र में 10 लाख जनसंख्या पर 50 जजों की बहाली के लिए 7000 करोड़ रूपए दिए जाएं।

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन ने ये मुदृदे उठाये है। इसके अतिरिक्त समाज में व्याप्त पढाई,लड़ाई, दवाई की कुव्यवस्था के कारण विभिन्न माफियाओं की वृद्धि,सामाजिक, आर्थिक विषमता में वृद्धि सरीखे मुदृदे अनेक संगठनो ने उठाये है। उसी प्रकार जमीन अधिग्रहण,खाद्य सुरक्षा, अवांछित क्षेत्रों में विदेशी पूँजी निवेश आदि महत्वपूर्ण मुद्दे कईं संगठनों द्वारा उठाये जा रहे है। दो सौ वर्षो से चली आ रही एकांगी अपूर्ण मानव केन्द्रित विकास बनाम प्रकृति केन्द्रित विकास के पटल पर उपर्युक्त सभी मुदृदे समाहित किए जा सकते है। भारत में भारत परस्त-गरीब परस्त नीतियों के इर्द-गिर्द राजनीति को बुने जाने की जरूरत राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन महसूस करता है। उसकी विधि एवं स्वरूप क्या हो, इसके लिए राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन उचित वातावरण तैयार करने का दायित्व अनुभव करता है। उपर्युक्त दायित्व निर्वाह के लिए सशक्त,संगठनात्मक रचना, पंचायतों से लेकर दिल्ली तक प्राथमिकता का विषय हो यह जरूरी है। संगठन की रचना में नई विधाएँ शामिल हो,यह भी प्रयोग का विषय है। समान लक्ष्य वाले एवं सहमना संगठनों,समूहों के साथ मिलकर संवाद, सहमति और सहकार्य की पद्धति से काम हो, इस हेतु राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के जिला स्तर तक के कार्यकर्ताओं की समझ बढे, यह आवश्यक है।

तदर्थ-

1. साहस,पहल,प्रयोग एवं संवाद,सहमति,सहकार्य की कार्य पद्धति का प्रशिक्षण जरूरी है।
2. यह अखिल भारतीय स्तर पर हो
3. साथ ही पंचायत हर स्तर पर कार्यकर्ता,कार्यालय,कोष,कार्यक्रम आदि उपांग सक्षम बने
4. साथ ही प्रवास,बैठक,संवाद,सह कार्यपद्धति,जन-संगठन की कार्यशैली,विविध प्रकार से जन संपर्क सरीखे पहलुओं का भी प्रशिक्षण सभी कार्यकर्ताओँ का प्राप्त हो।
5. ऐसी व्यवस्था खडी करना सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। इन सभी दृष्टियों से संगठन ताकतवर बने,जिलों में फैले,यह संगठन वर्ष की प्राथमिकता बनना चहिए। उपर्युक्त सभी पहलूओं के बारे में प्रारूप तैयार हो एवं सभी कार्यकर्ताओं की उस के आधार पर समझ बढे इसका ध्यान रहे।