राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन

परिचय

राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन भारत की सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक व्यवस्थाओं से उपजे मौलिक प्रश्नों का उत्तर तलाशने में सक्रिय विचारकों और कार्यकर्ताओं का एक लचीला संगठन है। आन्दोलन द्वारा सर्वस्वीकृत मूल्यों, मुद्दों और लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के कार्यकर्ताओं की श्रेष्ठता की कसौटी है। जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि का किसी भी प्रकार का विभाजक रुप इसमें मान्य नही है। आन्दोलन होने के नाते चुनावी राजनीति में इसकी भूमिका ना रही है ना आगे कभी रहेगी लेकिन देश की राजनीति को मूल्यों और मुद्दों की पटरी पर लाने और बनाये रखने के लिए आन्दोलन अपनी सक्रिय हस्तक्षेप की भूमिका से कभी पीछे नही हटेगा। चुनावी राजनीति से इतर यह एक सामाजिक राजनीतिक आन्दोलन है।

पृष्ठभूमि

मई, 2004 में लोकसभा चुनाव के पश्चात जब श्रीमती सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की आशंका उत्पन्न हो गयी, तब 15 मई, 2004 को राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के बैनर तले सफल अभियान चला। नवंबर, 2004 को प्रथम भारत विकास संगम का आयोजन हुआ, जिसमें तब तक संपर्क में आये हुए साथियों की सहभागिता रही। इसी सम्मेलन में व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता और अपरिहार्यता को प्रतिपादित किया गया। साथ ही व्यवस्था परिवर्तन के लक्ष्य को पाने के लिए रचनात्मक, आंदोलनात्मक तथा बौद्धिक कार्यों की त्रिवेणी को गुंथे जाने का संकल्प भी लिया गया। 2005 से 2007 तक देश में सघन प्रवास के द्वारा अधिकाधिक क्रियाशील सज्जन-शक्तियों से संवाद बढ़ाया गया। जनवरी, 2008 में द्वितीय भारत विकास संगम का आयोजन हुआ, जिसमें रचनात्मक, आंदोलनात्मक और बौद्विक कार्यों के स्वतंत्रा संगठनों के निर्माण का निर्णय हुआ। तदनुसार रचनात्मक कार्यों के लिए भारत विकास संगम, आंदोलनात्मक कार्यों के लिए राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन तथा बौद्विक कार्यों के लिए समग्र शोध संस्थान का पंजीकरण कराया गया।