कब तक अपमान का घूंट पीते रहेंगे हम? |
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पाकिस्तान के साथ बातचीत का सिलसिला चलाने के लिए हमारी सरकार इस कदर बिछे जा रही है कि उसे बड़े से बड़ा अपमान भी नज़र नहीं आता। पाकिस्तान की यात्रा पर गए विदेश मंत्री एस एम कृष्णा के साथ पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी का बर्ताव ये साफ ज़ाहिर करता है कि पाकिस्तान के साथ संबंध बनाने और बढ़ाने पर हमें अभी और सोचने की ज़रूरत है…और सरकार जल्दबाज़ी में है। ये जल्दबाज़ी जितनी जल्दी हो…ख़त्म होनी चाहिए। |
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बहुमत नहीं,…जनमत की सोचें:गोविंदाचार्य“महिला आरक्षण विधेयक के मुद्दे पर केंद्र सरकार को सर्वसम्मति के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए”…ये कहना है राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक के एन गोंविदाचार्य का। दिल्ली के प्रेस क्लब में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने इस मुद्दे पर अपनी राय रखी। उनका कहना था कि देशहित में यही है कि सरकार इस ऐतिहासिक मसले पर सबकी राय का आदर करे। उन्होंने इस मामले को लेकर किसी भी तरह की जल्दबाज़ी नहीं करने की सरकार से अपील की। बुलंद हुई आम जनता की आवाज़केंद्रीय बजट का 7 प्रतिशत सीधे ग्राम पंचायतों को देने की मांग को लेकर राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की तरफ से आयोजित तीन दिवसीय भूख हड़ताल का दिल्ली में 11 मार्च को समापन हो गया। इस कार्यक्रम में अपनी आवाज़ सरकार तक पहुंचाने के मक़सद से बड़ी संख्या में लोगों ने भागीदारी की। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित इस भूख हड़ताल की शुरूआत 9 मार्च को राष्ट्रीय संयोजक के एन गोंविदाचार्य ने की थी। कार्यक्रम में अलग-अलग राज्यों से कई समविचारी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। राष्ट्रीय स्वाभिमान आँदोलन के ग्राम स्वराज्य अभियान के तहत इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन का तीन दिवसीय धरना‘देश के सर्वांगीण विकास के लिए राष्ट्रीय बजट का 7 फीसदी हिस्सा नानाजी का प्रयाणनानाजी के जीवन का मर्म समाज के लिए सबकुछ त्यागने का था। वे ऐसी किसी भी व्यवस्था या स्थिति में ख़ुद को सहज नहीं पाते थे जहां अपने बारे में ज़्यादा सोचना पड़े। नानाजी का कहना था कि राजनेताओं को 60 साल के बाद राजनीति छोड़ देनी चाहिए। वे रचनात्मक कार्यों को बेहद ज़रूरी मानते थे। कैसी हो भारतपरस्त और गरीबपरस्त नीति?राजनीति की तारक शक्ति घटी है और मारक शक्ति बढ़ गई है। ऐसा समाज से सत्ता के घटते सरोकार की वजह से हुआ है। विपक्ष की कमज़ोर भूमिका भी इसकी वजह है। विपक्ष का काम गोलकीपर की तरह है जो सत्तापक्ष की मनमानी पर अंकुश लगाता है और गोल बचाता है। मौक़ा मिलने पर विपक्ष जनता के लिए सत्ता पक्ष की तरफ गोल दागता भी है लेकिन मौजूदा समय में उसके भिड़ने की क्षमता चूक गई है। आज सत्ता पक्ष और विपक्ष आपस में मिले हुए दिखाई देते हैं। ये स्थिति बदलनी चाहिए। गोल कौन करे,…ये महत्व की बात नहीं है बस गोल होना चाहिए। बेलगाम महंगाई पर रोक के लिए संघर्ष का शंखनादआम लोगों के बड़े पैमाने पर संगठित रूप से आंदोलित नहीं होने की वजह से ही केद्र सरकार बेपरवाह है और वो इसे बड़ी समस्या तक मानने को तैयार नहीं। अम्बानी गैस विवाद में सरकारी बेईमानी उजागरयदि रिलायंस द्वारा 4.2 डालर की दर से गैस बेची गयी तो पैट्रोलियम मंत्रालय को कुछ सौ करोड़ की रायल्टी अधिक मिलेगी। लेकिन सरकार की ही कंपनी एनटीपीसी को रिलायंस को हजारों करोड़ रुपए अधिक देने होंगे। यदि ऊर्जा मंत्रालय के हजारों करोड़ रुपए के लाभ और पेट्रोलियम मंत्रालय के कुछ सौ करोड़ के लाभ में चुनना हो तो स्वाभाविक रूप से ऊर्जा मंत्रालय के लाभ को चुनना चाहिए, भले ही पेट्रोलियम मंत्रालय को घाटा हो जाए। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। क्यों? गंगा के मामले में सरकार गंभीर नहींगंगा के उद्धार के लिए यदि सरकार गंभीर है तो उसे पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों, साधु-संतों, वैज्ञानिकों और गंगा से सरोकार रखने वालों को भी प्राधिकरण में शामिल करना चाहिए। ऐसे लोगों की संख्या प्राधिकरण में आधे से अधिक होनी चाहिए। |
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