केन्द्रीय बजट का सात प्रतिशत सीधे ग्राम पंचायतों को मिले
सन 1993 में 73 वें संविधान संशोधन से देश में ‘पंचायती राज’ की स्थापना हुई। इससे ग्राम पंचायतों का ढांचा खड़ा हुआ और उन्हें विकास कार्यों के अधिकार भी मिले। पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था न करने से ‘पंचायती राज’ का सपना अधुरा ही रह गया। ‘पंचायती राज’ को स्थापित हुए 20 वर्ष होने आ गए पर अभी भी केन्द्र सरकार ग्राम पंचायतों को धान मुहैया कराने पर विचार ही कर रही है। केन्द्र सरकार के अलग-अलग मंत्रालयों में विचारों के आदान-प्रदान की खानापूर्ति ही हो रही है। इस सरकारी जंजाल से मुक्ति पाने के लिए राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संस्थापक-संरक्षक तथा सुप्रसिद विचारक श्री के. एन. गोविंदाचार्य जी ने सरकार के सामने सीधी मांग रखी है। चूंकि आज भी गांवों में लगभग ७०% आबादी रहती है अतः केन्द्रीय बजट से कम से कम ७% राशि सीधे ग्राम पंचायतों को दी जाए।
सन 2011-12 में केन्द्रीय बजट 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक का था और देश में 2.5 लाख ग्राम पंचायतें हैं। इस हिसाब से प्रत्येक ग्राम पंचायत को औसत 30 लाख रुपये मिलेंगे जो बजट राशि के साथ प्रतिवर्ष बढ़ते जाएंगे। ग्राम-विकास के क्षेत्र में सफलतापूर्वक काम किए समाजसेवकों के हिसाब से अगर प्रतिवर्ष इतना धन ग्राम-पंचायतों को मिलने लगे तो वह गावो का कायाकल्प करने के लिए पर्याप्त होगा। धन के इस हस्तांतरण को सरलतम बनाने तथा उसके उपयोग को अधिकतम प्रभावी और लाभदायी बनाने के लिए निम्न रूप से लागू करने की भी हम मांग करते हैं-
(१) केन्द्र सरकार सीधे ग्राम पंचायतों के बैंक खातों में धन भेजे।
(२) ग्राम सभा विकास कार्यों को मंजूर करे।
(३) ग्राम सभा द्वारा स्वीकृत योजनाओं को ग्राम पंचायत लागू करे।
(४) राज्य सरकार केवल ग्राम पंचायतों के बही खातों की आडिट करे।
(५) बजट के बाद प्रति वर्ष मार्च में हस्तांतरित राशि का प्रचार-प्रसार उसी तरह हो जैसे सरकार आजकल पोलियो निर्मूलन अभियान चलाती है।












